नई दिल्ली (उमाशंकर त्रिपाठी):- भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कि इस बड़े बया के ऊपर जरा ध्यान से गौर कीजिए भारतीय जनता पार्टी के लिए महागठबंधन की कोई बड़ी चुनौती नहीं है 2019 में भी हमारी वापसी होगी यह पक्का है हां उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के गठबंधन से कुछ चुनौती जरूर खड़ी हो सकती है बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के इस बयान यह बयान हाल ही में कुछ कार्यक्रमों के दौरान महा गठबंधन को लेकर पूछे गए पत्रकारों के सवालों पर आए हैं और उनकी बातों से लगता है कि भारतीय जनता पार्टी खुद की अंदर खाते में यूपी में सपा बसपा के प्रभावित कट बंधन को लेकर कुछ बड़ी घबराहट जरूर है मगर यह बात अलग है कि चुनावी रणनीति के तहत बड़ी घबराहट को उजागर नहीं होना देना चाहती राजनीतिक व्यंग्य जानकारों की के मुताबिक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के पास जिस तरह से थोक में जाति विशेष का बेस्ट वोट बैंक है अगर 2019 में एकजुट हुआ तो भारतीय जनता पार्टी के हिंदू वोटर के फार्मूले पर जाति समीकरण भारी पूरी तरह से पढ़ सकती है यह ठीक उसी तरह होगा जैसे बिहार में राजद और जदयू के कांग्रेस के साथ बनाए महागठबंधन की जाति समीकरणों ने फिर के अंदर भारतीय जनता पार्टी उलझ कर रह गई थी

यूपी के सियासी गलियारों में इस वक्त महागठबंधन की स्थिति में सीट शेयरिंग का खाका तैयार हो जाने की खबरें उड़ उड़ कर आ रही है और इन खबरों के मुताबिक उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 8:30 पर बहुजन समाजवादी पार्टी मायावती चुनाव लड़ेगी तो 37 सीटों के ऊपर समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव चुनाव लड़ेंगे जबकि 3 सीटों पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में असरदार चौधरी अजीत सिंह की पार्टी राठौर के खाते में जाएंगे वहीं दो सीटें कांग्रेस के सम्मान में छोड़ने का फैसला भी हुआ है उत्तर प्रदेश के रायबरेली और अमेठी की सीट यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए छोड़ने की तैयारी की गई है यह तो रहा उत्तर प्रदेश में बुआ बबुआ का गठबंधन का बड़ा गणित यह दीवार बात है कि बसपा सपा के नेता अभी ऐसे किसी समझौते को खारिज करते नजर आ रहे हैं और खुद बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती के बाद दूसरे नंबर के नेता सतीश मिश्रा इस बात को बेबुनियाद बता रहे हैं कि पार्टी के ही दूसरे नेता दबी जुबान में गठबंधन के लिए ऐसे समीकरण को खारिज नहीं कर रहे हैं शायद उनको कुछ ज्यादा ही पता लेकिन सतीश मिश्रा के बयान को पार्टी की एक रणनीति भी कहा जा सकता है और इसी के चलते शायद सतीश मिश्रा कुछ ज्यादा कहना नहीं चाहते हैं

उत्तर प्रदेश में आज ही सवर्णों का एक बड़ा तबका सोनिया गांधी की राहुल गांधी की कांग्रेस का वफादार वोट रहा है और यह समझा जाता है कि दो दलों के साथ आ जाते हैं उनके वोट बैंक परसपर शिफ्ट हो जाते हैं मगर उत्तर प्रदेश की रणनीति को गहराई से समझे रे वालों रणनीति विशेषज्ञ इस बात को खारिज करते हैं और उनका कहना है कि रणनीति में दो में दो जोड़े प्रचार इन आएंगे यह जरूरी नहीं है कि रणनीतिक गणित नहीं केमिस्ट्री होती है यहां दो चीजें मिलने पर कुछ और समीकरण बन जाते हैं यह बात भी तय है विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार दो अलग मिजाज के राजनीतिक दलों के बीच बेमिसाल गठबंधन से किसी तीसरे को बड़ा फायदा हो जाता है जैसे कि 2017 के विधानसभा चुनाव में हुआ था कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी के गठबंधन करने का दोनों दलों को पैदा बिल्कुल भी नहीं हुआ ना कांग्रेस के स्वर्ण वोटर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को वोट देने गए और ना ही सपा के मतदाताओं ने कांग्रेस की उम्मीदवार को वोट दिया और यह भी एक बड़ी वजह बताई जा रही है कि 2017 में 9 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी कांग्रेस के साथ सीटों पर जीत सकी जबकि समाजवादी पार्टी के खाते में महज 47 सीट 2012 के चुनाव में देखा जाए तो इसी समाजवादी पार्टी को अकेले चुनाव लड़ने पर 220 224 सीटें मिली थी और 2017 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी की कांग्रेस के स्वर मतदान मतदाताओं ने बीजेपी शिफ्ट होने की बात सामने निकल कर आई थी और 1996 में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद समाज बहुजन समाजवादी पार्टी यह चीज पूरी तरह से भूल चुकी है उस वक्त बहुजन समाजवादी पार्टी का मशहूर हुआ था कि कांग्रेस के साथ गठबंधन कर कोई फायदा नहीं हुआ वहीं 2017 में समाजवादी पार्टी के लिए कांग्रेस फायदेमंद साबित नहीं हुई