नई दिल्ली उमाशंकर त्रिपाठी):– ज्‍येष्‍ठ माह के शुक्‍ल पक्ष की अमावस्या को वट पूर्णिमा व्रत किया जाता है सुहागन औरतें अपने पति की लंबी उम्र के लिए इस व्रत को रखती हैं जानकार लोगों का यह भी मानना है कि इस देना सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लेकर आ गई थी और उस दिन के बाद ही उसे सती सावित्री कहा जाने लगा था और आपको बता दें कि इस साल लगभग सावित्री व्रत 3 जून को यानी कि आज मनाया जा रहा है प्यारे पाठकों को बताएं इस व्रत की पूरी कथा है क्या,,?

बहुत समय पहले की बात है अष्टपति नाम का एक बहुत ही सच्चा और ईमानदार राजा था उस राजा की एक बेटी थी जिसका नाम था सबित्री और जब सावित्री शादी के योग्य हुई तब उसकी मुलाकात सत्यवान से हुई और खास बात यह है कि सत्यवान की कुंडली में सिर्फ 1 वर्ष का ही जीवन शेष बचा था और सावित्री अपने पति के साथ बरगद के पेड़ के नीचे बैठी हुई थी सावित्री की गोद में सिर रखकर सत्यवान लेटे हुए थे कि अचानक तभी उसके प्राण लेने के लिए यमलोक से यमराज के दूत पहुंच गए पर सावित्री ने अपने पति के प्राण नहीं ले जाने दिए और इसके बाद यमराज को खुद सत्यवान के प्राण लेने के लिए आना पड़ा सावित्री के मना करने पर यमराज उसे वरदान मांगने को कहते हैं और उसके बाद सावित्री ने वरदान में अपने सास-ससुर की सुख-शांति मांग ली और यमराज ने उसे वह दे विधि पर सावित्री यमराज का पीछा नहीं छोड़ती है जिसके बाद यमराज फिर से सावित्री को वरदान मांगने के लिए कहते हैं और सावित्री अपने माता पिता की सुख-समृद्धि मांगती है यमराज तथास्तु बोलकर आगे बढ़ते हैं पर सावित्री फिर भी यमराज का पीछा नहीं छोड़ती और यमराज उसे आखरी वरदान मांगने को कहते हैं सावित्री वरदान में एक पुत्र मांगती है यमराज अब आगे बढ़ने लगते हैं तो सावित्री कहती है कि पति के बिना मैं कैसे पुत्र प्राप्त कर सकती हूं यह सुनने पर यमराज ने उसकी लगन बुद्धिमता देखकर प्रसन्नता हुई और उन्होंने सावित्री के पति के प्राण को वापस कर दिया

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।